नई दिल्ली।कर और सीमा शुल्क से जुड़े विवादों में शब्दों की व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि टैक्सेशन कानूनों के तहत किसी वस्तु का वर्गीकरण करते समय सामान्य या व्यापारिक बोलचाल की भाषा को आधार बनाना अपवाद होना चाहिए, न कि नियम।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने कस्टम ड्यूटी, एक्साइज ड्यूटी और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण (सीईएसटीएटी) के एक फैसले को चुनौती देने वाली दीवानी अपील की सुनवाई के दौरान की। मामला एक कंपनी द्वारा आयातित एल्युमीनियम शेल्फ के वर्गीकरण से जुड़ा था, जिसे सीईएसटीएटी ने कृषि मशीनरी के “पुर्जों” की श्रेणी में रखने का आदेश दिया था। इस पर आपत्ति जताते हुए तर्क दिया गया था कि इसे साधारण एल्युमीनियम संरचना के रूप में देखा जाना चाहिए।
दो जजों की पीठ का स्पष्ट रुख
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि सामान्य या व्यापारिक अर्थ की कसौटी का इस्तेमाल बहुत सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। अदालत के अनुसार, इसका उद्देश्य केवल यह समझना होता है कि किसी टैरिफ शीर्षक में प्रयुक्त शब्द का आम या वाणिज्यिक अर्थ क्या है, न कि कानून द्वारा तय मानकों को दरकिनार करना।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि वर्गीकरण से जुड़े विवादों में सामान्य बोलचाल की भाषा का सहारा तभी लिया जा सकता है जब संबंधित टैरिफ शीर्षक, अध्याय नोट्स, अनुभाग नोट्स या एचएसएन व्याख्यात्मक नोट्स में उस शब्द की कोई स्पष्ट परिभाषा या मानदंड न दिए गए हों। इसके अलावा, यदि टैरिफ में प्रयुक्त शब्द वैज्ञानिक या तकनीकी प्रकृति के हों, तो उनकी व्याख्या उसी तकनीकी संदर्भ में की जानी चाहिए।
कानून मौन हो, तभी मिलेगा सामान्य अर्थ का सहारा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां कानून प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मार्गदर्शन देता है, वहां सामान्य या व्यापारिक शब्दावली परीक्षण लागू नहीं किया जा सकता। यदि विधायिका ने किसी शब्द की स्पष्ट परिभाषा दी है, तो वही अंतिम होगी। वहीं, जब शब्द तकनीकी हों या विशेष संदर्भ में प्रयुक्त किए गए हों, तो उनका अर्थ भी उसी अनुरूप तय किया जाएगा।
अदालत ने कहा कि केवल उसी स्थिति में न्यायालय या न्यायाधिकरण सामान्य बोलचाल के अर्थ का सहारा ले सकते हैं, जब कानून पूरी तरह मौन हो और विधायी मंशा स्पष्ट न हो।
शुल्क निर्धारण में कानूनी अर्थ को प्राथमिकता
शीर्ष अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि किसी शुल्क या कर मद की व्याख्या करते समय आम भाषा के आधार पर कानून के स्पष्ट प्रावधानों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शब्दों को उनके वैधानिक और कानूनी संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए, क्योंकि सामान्य या व्यापारिक अर्थ के सहारे कानून के आदेश का उल्लंघन स्वीकार्य नहीं है।
इस फैसले को कर और सीमा शुल्क मामलों में भविष्य की व्याख्याओं के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है।